History Of hast rekha सम्पूर्ण हस्त रेखा शास्त्र का उद्गम और विकास

प्राचीन काल से ही मनुष्य अपने जीवन में होने वाली घटनाओं को जानने के प्रति उत्सुक रहा है|
ज्योतिष शास्त्र के द्वारा मनुष्य के जीवन में होने वाली शुभ अशुभ घटनाओं की जानकारी प्रदान की जा सकती है |
आज हम बात करेंगे ज्योतिष के ही अंग हस्तरेखा शास्त्र के बारे में हस्तरेखा परीक्षण के द्वारा परीक्षण करके किस प्रकार से व्यक्ति का भविष्य कथन कहा जा सकता है | बहुत से जातियों के पश्चात अपना जन्म समय डेट ऑफ बर्थ नहीं होती है| तो उस स्थिति में वह अपना भविष्य किस प्रकार से ज्ञात करें यह वह सोचते हैं , तो हस्तरेखा शास्त्र भी एक ऐसा उपाय है जिसके द्वारा मनुष्य अपने जीवन में भूत भविष्य वर्तमान में होने वाली घटनाओं के बारे में जान सकता है|  ज्योतिष शास्त्री हस्तरेखा शास्त्री व्यक्ति के हस्त का परीक्षण करके उसके भविष्य में होने वाले भूत भविष्य वर्तमान में होने वाली घटनाओं की जानकारी प्रदान कर सकता है|
हस्तरेखा सामुद्रिक शास्त्र का ही एक अंग है सामुद्रिक शास्त्र के द्वारा व्यक्ति के संपूर्ण शरीर का निरीक्षण करके उसके भूत भविष्य वर्तमान की जानकारी प्रदान की जाती है अर्थात व्यक्ति के ललाट मुख्य नाक नक्शा संपूर्ण शरीर हाथ-पैर इन सभी को देखकर चाल-ढाल को देखकर परीक्षक व्यक्ति के भविष्य के बारे में कथन कह सकता भविष्यफल कहता है|
उसी प्रकार हस्तरेखा शास्त्री जातक की हथेली का परीक्षण करके जातक के मन में उठने वाले सभी सवालों का जवाब हाथ की हथेली का निरीक्षण कर कर ही कर सकता है उसके भूत भविष्य वर्तमान का फलकथन कहता है
अब हम बात करते हैं हस्तरेखा शास्त्र के इतिहास के बारे में
हस्तरेखा शास्त्र स्वास्थ्य के बारे में दो मध्य
  प्रचलित है
1. प्रथम भारतीय मत
2. द्वितीय ग्रीक मत
1.. भारतीय मत के अनुसार हस्त रेखा का जन्म भारतवर्ष में हुआ भारतीय विद्वानों के अनुसार प्राचीन काल में महर्षि वाल्मीकि के द्वारा हस्तरेखा शास्त्र पर पुस्तक लिखी,
भारतीय ज्योतिष शास्त्री होने के अनुसार ज्योतिष विज्ञान की भांति सामुद्रिक विज्ञान का उद्गम स्थान भी भारतवर्ष को ही माना जाता है भारतीय ज्योतिष शास्त्रियों के अनुसार शास्त्रों वर्षों पूर्व भारतीय मनीष जी ऋषि व्यास जी श्री सूर्य बृबु अत्री कश्यप वात्सायन भारद्वाज कात्यायन आदिऋषियों ने लोक कल्याण के लिए इस विद्या का प्रचार प्रसार किया श्रीमद् वाल्मीकि रामायण महाभारत स्कंद पुराण ऑडियो में इस ग्रंथ का वर्णन मिलता है कहा जाता है कि प्राचीन काल में समुद्र नाम के ऋषि इस विद्या के प्रकांड विद्वान हुए उन्होंने इस शास्त्र का लोक कल्याण के लिए अधिकाधिक व्यापक प्रचार प्रसार किया जिसके फलस्वरुप इस शास्त्र का नाम सामुद्रिक शास्त्र रखा गया भारतीय मान्यता मान्यता अनुसार इस देश पर विदेशियों का आक्रमण हुआ जिस के दुष्प्रभाव स्वरूप भारत का साहित्य भंडार शिन्हुआ और सामुद्रिक विद्या भी उससे अछूती नहीं रही भारतीय विद्वानों की मान्यतानुसार 5000 वर्ष पूर्व इस विद्या का आदान प्रदान भारतवर्ष से बाहर हुआ ग्रीस रोम चीन आदि देशों में इस विद्या का पदार्पण हुआ प्रचार-प्रसार हुआ वहां से चल कर यह विद्या यूरोप तथा विश्व के अन्य भागों में फैली इस प्रकार से यह विद्या संपूर्ण विश्व में फैल चुकी थी आधुनिक मान्यता अनुसार हस्तरेखा शास्त्र का स्वरूप है वह पाश्चात्य स्वरूप कहलाता है उसे पाश्चात्य विद्वानों की देन भी कहा जाता है यह भारतवर्ष के लिए प्रसन्नता का विषय है कि उसकी विद्या संपूर्ण विश्व के कल्याण के लिए काम आ रही है अतः इस विद्या का जन्म स्थान भारतवर्ष ही माना जाना चाहिए यह मेरा मत है


2.
पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार हस्तरेखा शास्त्र का जन्म ग्रीस में 348 से 322 ईसापूर्व के मध्य में हुआ प्राचीन मान्यता अनुसार अरस्तु को 384 -322 ईशापुर में ग्रीस के देवता हमें इसके ग्रंथ में प्राप्त माना जाता है|
 जिसे सिकंदर महान को भेंट किया गया था सिकंदर महान की रुचि इस कला में गहरी थी और उन्होंने अपने अधिकारियों के द्वारा हस्तरेखा शास्त्र का अपने विद्वानों के द्वारा विश्लेषण किया हिप्पोक्रेटस ने अपने रोगियों के रोग निदान के लिए इस विद्या का प्रयोग किया यह विद्या भारत तिब्बत चीन फारस मिश्र और ग्रीस यूरोप के अन्य देशों में इस विद्या का प्रचार-प्रसार हुआ पाश्चात्य मत के अनुसार कहीं प्राचीन समुदाय तिब्बती मिश्र फर्जी होने इस विद्या के लिए अपना उल्लेखनीय योगदान दिया |

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